राजस्थान के लोक नाट्य, कठपुतली कला और सांस्कृतिक संस्थान | Rajasthan Folk Theatre Part-2
राजस्थान के अन्य विशिष्ट लोक नाट्य
राजस्थान की कला संस्कृति में 'मेरुनाट्य' से लेकर 'कठपुतली' तक कई ऐसी विधाएँ हैं जो दुनिया भर में अपनी अमिट छाप छोड़ चुकी हैं।
1. गवरी नाट्य: लोक नाट्यों का मेरुनाट्य
गवरी को राजस्थान के सभी लोक नाट्यों का 'मेरुनाट्य' कहा जाता है।
- परंपरा: गवरी की समाप्ति से दो दिन पहले ज्वार बोए जाते हैं और एक दिन पहले कुम्हार के यहाँ से मिट्टी का हाथी लाया जाता है।
- गवरी की घाई: मूल कथानक को जोड़ने के लिए मध्य में किए जाने वाले नृत्य को 'गवरी की घाई' या गम्मत कहा जाता है।
2. तमाशा (जयपुर की शान)
जयपुर नरेश प्रतापसिंह के काल में तमाशा परंपरा का आरंभ हुआ।
- मिश्रण: यह लोक नाट्य जयपुरी ख्याल और ध्रुपद गायकी का अनूठा मिश्रण है, जिसके प्रवर्तक बंशीधर भट्ट थे।
- प्रमुख खेल: जयपुर में होली के दिन 'जोगी-जोगन', दूसरे दिन 'हीर रांझा' और चैत्र अमावस्या को 'गोपीचन्द' तमाशा खेला जाता है।
- इतिहास: महाराजा मानसिंह के काल में 1594 में मोहन कवि द्वारा रचित 'धमाका मंजरी' का प्रदर्शन आमेर में हुआ था।
3. भवाई नाट्य
यह नृत्य नाटिका 'सगौजी' और 'सगीजी' के रूप में भोपा-भोपी द्वारा प्रस्तुत की जाती है।
- इसमें बीकाजी के खेलों की प्रधानता होती है।
- इसकी प्रसिद्ध नृत्य नाटिका 'जस्मा ओडण' का प्रदर्शन विदेशों में भी किया जा चुका है।
4. कठपुतली लोक नाट्य
उदयपुर क्षेत्र में प्रचलित यह विधा राजस्थान की एक पहचान है।
- प्रदर्शन: पात्र अपने मुँह में एक विशेष सीटी रखते हैं जिससे कठपुतलियों की आवाज़ निकलती है।
- प्रसिद्ध खेल: पृथ्वीराज-संयोगिता, सिंहासन बत्तीसी और अमरसिंह राठौड़ इसके प्रमुख नाटक हैं।
- संस्थान: उदयपुर का 'लोक कला मण्डल' कठपुतली खेल के संरक्षण के लिए प्रसिद्ध है।
5. माच के ख्याल
यह मूलतः 'मंच' शब्द का अपभ्रंश है और गाँवों में मंदिरों के पास तख्तों पर खेला जाता है।
- जन्मदाता: भीलवाड़ा के बगसू राम को माच ख्याल का जन्मदाता माना जाता है।
- विशेषता: यह मारवाड़ क्षेत्र में सर्वाधिक लोकप्रिय है और इसमें 'रानी' पात्र की वेशभूषा सर्वाधिक आकर्षक होती है।
- वादन: इसमें सारंगी, ढोलक और नगाड़ों का प्रमुखता से प्रयोग किया जाता है।
6. अन्य महत्वपूर्ण नाट्य रूप
- गन्धर्व नाट्य: मारवाड़ के गन्धर्वों द्वारा जैन धर्म पर आधारित संगीत नाट्यों (जैसे अंजना सुन्दरी, मैना सुन्दरी) का प्रदर्शन किया जाता है।
- चारबैंत: यह टोंक के नवाब फैजुल्ला खाँ के समय शुरू हुई एक गायन प्रधान विधा है, जिसमें गायक 'डफ' बजाते हुए घुटनों के बल बैठकर अपनी बात कहता है।
- निक्कड़ नाट्य: शहरों या गाँवों के चौराहों पर प्रदर्शित होने वाले इन नाटकों में भवाई, बहुरूपियों के स्वांग और नटों के करतब दिखाए जाते हैं।
- सवारी नाट्य: सांगोद का न्हाण, चित्तौड़ के बस्सी का गणेश और जयपुर की 'नृसिंह' की सवारी पूरे राजस्थान में प्रसिद्ध है।
- बैठकी नाट्य: यह जमीन पर आमने-सामने बैठकर सवाल-जवाब के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
राजस्थान के पारंपरिक लोक नाट्य: विविध रंग और शैलियाँ
राजस्थान की सांस्कृतिक विविधता यहाँ के लोक नाट्यों में स्पष्ट झलकती है। "image_a8c417.jpg" के अनुसार, यहाँ की कुछ प्रमुख नाट्य शैलियाँ इस प्रकार हैं:
1. कठपुतली नाट्य
यह काठ (लकड़ी) से बने धड़ वाली बिना पाँव की गुड़िया होती है।
- विशेषताएँ: इनके चेहरे गोल, आँखें बड़ी और नाक लंबी होती है। पुतलियाँ 14 से 16 इंच लंबी होती हैं।
- वादन: सूत्रधार अपने मुँह में एक विशेष सीटी रखता है और पुतलियों की बोली निकालता है, जिसे ढोलक बजाने वाली महिला शब्दों में बदलती है।
- प्रमुख खेल: 'सिंहासन बत्तीसी' (विक्रमादित्य के समय की), 'पृथ्वीराज संयोगिता' और 'अमरसिंह राठौड़' के खेल अत्यंत लोकप्रिय हैं। राजस्थान के नट और भाट जाति के लोग मुख्य रूप से इस कला से जुड़े हैं।
2. प्रमुख क्षेत्रीय ख्याल
- कुचामणी ख्याल: नागौर जिले के कुचामन क्षेत्र में प्रचलित है। इसके प्रवर्तक लच्छीराम थे। इसका स्वरूप 'ओपेरा' जैसा होता है और इसमें सामाजिक व्यंग्य की प्रधानता होती है। उगमराज और बंशीलाल इसके प्रमुख कलाकार हैं।
- शेखावाटी ख्याल: इसके प्रवर्तक नानूराम थे और उनके शिष्य दुलिया राणा भी विख्यात कलाकार रहे हैं। इसमें सारंगी, हारमोनियम और नगाड़ा जैसे वाद्यों का प्रयोग होता है।
- जयपुरी ख्याल: इसकी अनूठी विशेषता यह है कि इसमें स्त्री पात्रों की भूमिका स्त्रियों द्वारा ही निभाई जाती है। इसके प्रमुख विषयों में जोगी जोगन, कान-गुजरी और मियाँ बीबी शामिल हैं।
- हेला ख्याल: यह लालसोट (दौसा) क्षेत्र में बहुत प्रचलित है। इसमें लंबी टेर (हेला) देना इसकी मुख्य पहचान है और प्रारंभ में 'बम' (बड़ा नगाड़ा) बजाया जाता है।
3. चारबैंत (टोंक की गायन शैली)
यह टोंक नगर की एक लोक गायन शैली है जो मूल रूप से 'पठानी मूल' की है।
- प्रस्तुति: गायक परंपरागत वाद्य 'डफ' बजाकर कव्वाली की तरह घुटनों के बल बैठकर गीत गाते हैं।
- इतिहास: टोंक में यह नवाब फैजुल्ला खाँ के समय शुरू हुई। भारत में इसके प्रवर्तक 'अब्दुल करीम खां' माने जाते हैं।
4. रासधारी और रासलीला
- रासधारी: यह मुख्य रूप से भगवान कृष्ण के जीवन पर आधारित होती है और उदयपुर के आसपास के क्षेत्रों में प्रचलित है। इसके मुख्य गायक 'रसिया' बैरागी साधु होते हैं।
- रासलीला: इसमें समस्त नौरसों का समावेश होता है। वर्तमान में हरगोविंद स्वामी और रामस्वरूप स्वामी का रासमंडल अत्यंत प्रसिद्ध है।
5. लीलाएँ और अन्य उत्सव
- राजस्थान में रामलीला, रासलीला और समयसनकादियों की लीलाएँ प्रमुख रूप से प्रचलित हैं।
- जोधपुर में 'नृसिंह चतुर्दशी' को मूलके का मेला भरता है और गणगौर के पर्व के बाद 'धींगा गवर' का मेला आयोजित होता है, जिसमें महिलाएँ स्वांग रचाती हैं।
राजस्थान के लोक नाट्य और परंपराएँ
1. दंगल और दंगली नाट्य
राजस्थान के पूर्वी अंचल में प्रचलित यह विधा शास्त्रीय गायन और लोक धरातल का अनूठा संगम है।
- प्रमुख क्षेत्र: सवाई माधोपुर, धौलपुर, करौली और टोंक इसके मुख्य केंद्र हैं।
- कन्हैया दंगल: करौली क्षेत्र में प्रसिद्ध, जहाँ रामायण और महाभारत के आख्यान प्रस्तुत किए जाते हैं। इसमें जब 'कहन' कही जाती है, तब वाद्य यंत्र बंद हो जाते हैं।
- हेला दंगली: लालसोट (दौसा) क्षेत्र में प्रचलित है, जहाँ ऊँची आवाज में 'हेला' देना इसकी विशेषता है।
- भेंट दंगल: धौलपुर का बाड़ी-बसेड़ी क्षेत्र इसके लिए जाना जाता है, जहाँ देवताओं से जुड़े धार्मिक आख्यान गाए जाते हैं।
2. रम्मत (लोक नाट्य)
बीकानेर में रम्मतों का आयोजन फाल्गुन शुक्ल पक्ष में किया जाता है।
- आयोजन: यह रात के 1 बजे से सुबह 8 बजे तक 'दमनियों के चौक' और 'भट्टों के चौक' जैसे स्थानों पर खेली जाती है।
- हेडाऊ मेरी री रम्मत: यह सर्वाधिक लोकप्रिय रम्मत है जो आख्यान प्रधान है और गद्य-पद्य दोनों में होती है।
- अमरसिंह री रम्मत: यह राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार करती है और इसका आयोजन आचार्यों के चौक में होता है।
3. भवाई लोक नाट्य
यह एक व्यावसायिक लोक नाट्य है, जिसे पेशेवर भवाई जाति द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।
- प्रमुख पात्र: इसमें सूरदास, डोक़री और बीकाजी जैसे पात्र प्रमुख होते हैं।
- जस्मा ओडन: शांता गांधी द्वारा लिखित इस भवाई नाट्य को लंदन और जर्मनी में भी प्रदर्शित किया गया है।
- विशेष कलाकार: बाड़मेर के सांगीलाल सांगड़िया भवाई नाट्य के विश्व प्रसिद्ध कलाकार हैं, जिन्हें 'नृत्यमणि' की उपाधि दी गई है।
राजस्थान के प्रमुख सांस्कृतिक संस्थान
राजस्थान की कला और संस्कृति को सहेजने के लिए कई महत्वपूर्ण संस्थानों की स्थापना की गई है:
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संस्थान का नाम |
स्थान |
स्थापना वर्ष |
मुख्य उद्देश्य/विशेषता |
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राजस्थान संगीत संस्थान |
जयपुर |
1950 |
शास्त्रीय गायन, सितार, वायलिन और कथक नृत्य का शिक्षण। |
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राजस्थान संगीत नाटक अकादमी |
जोधपुर |
1957 |
लोक संगीत, नृत्य और नाट्य विधाओं का प्रचार-प्रसार व प्रशिक्षण। |
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जयपुर कथक केन्द्र |
जयपुर |
1978 |
जयपुर घराने की प्राचीन शास्त्रीय शैली को पुनर्जीवित करना। |
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भारतीय लोक कला मण्डल |
उदयपुर |
1952 |
लोक कलाओं और कठपुतली विधा का शोध, सर्वेक्षण एवं प्रचार। भारतीय लोक कला मण्डल की स्थापना पद्मश्री (स्वर्गीय) देवीलाल सामर द्वारा की गई थी, जिसका मुख्य लक्ष्य विलुप्त होती लोक कलाओं का संरक्षण करना है। |
1. लोक संस्कृति संग्रहालय (उदयपुर)
यह संस्थान अपनी अंतरराष्ट्रीय ख्याति के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ देश-विदेश के सैलानी और शोधकर्ता (Researchers) अध्ययन के लिए आते हैं।
- विशेष आयोजन: लोक कला मंडल द्वारा यहाँ प्रतिवर्ष 'बाल कठपुतली समारोह' का आयोजन किया जाता है। इसके अलावा अखिल भारतीय लोक कला संगोष्ठियाँ और कार्यशालाएँ भी आयोजित होती हैं।
2. रवीन्द्र मंच, जयपुर
- स्थापना: इसका उद्घाटन 15 अगस्त, 1963 को तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा एवं वैज्ञानिक अनुसंधान मंत्री श्री हुमायूँ कबीर द्वारा किया गया था।
- महत्व: इसके बनने के बाद जयपुर में रंगमंच (Theatre) की गतिविधियों में काफी तेजी आई। यहाँ एक मुख्य सभागार, ओपन एयर थिएटर और पूर्वाभ्यास कक्ष उपलब्ध हैं।
3. नाट्य विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय (जयपुर)
- स्थापना: सन् 1977 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के सहयोग से इसकी स्थापना हुई।
- कोर्स: शुरुआत में यहाँ एक वर्षीय सर्टिफिकेट कोर्स था, जो अब डिप्लोमा और डिग्री कोर्स में बदल चुका है। यहाँ नाट्य विशेषज्ञों द्वारा समय-समय पर संगोष्ठियाँ आयोजित की जाती हैं।
4. पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, उदयपुर
- उद्देश्य: राजस्थान के कलाकारों को एक बड़ा मंच प्रदान करने के लिए भारत सरकार द्वारा स्थापित सात केंद्रों में से एक है।
- स्थापना: उदयपुर में इसकी स्थापना सन् 1986 में की गई।
- शिल्प ग्राम: लुप्त हो रही लोक कलाओं और हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के लिए उदयपुर से 13 किमी दूर एक 'शिल्प ग्राम' की स्थापना की गई है।
5. राजस्थान ललित कला अकादमी, जयपुर
- स्थापना: राज्य में कला के प्रचार-प्रसार और कलाकारों को प्रोत्साहित करने के लिए सन् 1957 में इसकी स्थापना हुई।
- प्रमुख कार्य: कला प्रदर्शनियों का आयोजन करना और प्रतिष्ठित कलाकारों को 'फैलोशिप' प्रदान करना।
6. जवाहर कला केन्द्र, जयपुर
- उद्देश्य: विलुप्त हो रही कलाओं के संरक्षण और विकास के लिए इस केंद्र को बनाया गया।
- संरचना: यह लगभग 9 एकड़ क्षेत्र में फैला है और इसमें 9 सभागार खण्ड हैं।
- सुविधाएं: यहाँ ढाई हजार वर्ग फीट का प्रदर्शनी क्षेत्र, थिएटर, पुस्तकालय और एक शिल्प ग्राम (ग्रामीण जीवन शैली की झोपड़ियाँ) भी है। यहाँ चाक्षुष कलाओं, संगीत और नृत्य से संबंधित चार प्रमुख विभाग कार्यरत हैं।
चित्रकला के विकास हेतु कार्यरत अन्य संस्थाएँ
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संस्था का नाम |
स्थान |
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चितेरा |
जोधपुर |
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धोराँ |
जोधपुर |
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तूलिका कलाकार परिषद |
उदयपुर |
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टखमण-28 |
उदयपुर |
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कलावृत्त |
जयपुर |
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आयाम |
जयपुर |
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क्रिएटिव आर्टिस्ट ग्रुप |
जयपुर |
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पैग |
जयपुर |
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