मारवाड़ का इतिहास 1
मारवाड़ क्षेत्र पर लंबे समय तक राठौड़ वंश का शासन रहा। इस वंश की वास्तविक उत्पत्ति को लेकर इतिहासकार एकमत नहीं हैं, और अलग-अलग स्रोतों में अलग-अलग व्याख्याएँ मिलती हैं:
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परंपरागत भाट-साहित्य में राठौड़ों को हिरण्यकश्यप के वंशज के रूप में दर्शाया गया है।
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जोधपुर रियासत की ऐतिहासिक ख्यातों में इनका संबंध राजा विश्वुतमान के पुत्र वृहदबल से जोड़ा गया है।
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इतिहासकार दयालदास इन्हें सूर्यवंशी शाखा और ब्राह्मण भल्लराव की संतान मानते हैं।
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मुहणौत नैणसी के अनुसार मारवाड़ के राठौड़ मूलतः कन्नौज से यहाँ आकर बसे।
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कर्नल जेम्स टॉड ने वंशावली-अध्ययन के आधार पर इन्हें सूर्यवंशी घोषित किया।
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मतभेदों के बावजूद अधिकांश विद्वान इस बात पर सहमत हैं कि राठौड़ों का संबंध दक्षिण भारत के राष्ट्रकूट राजवंश से रहा है।
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इस प्रकार राठौड़ वंश की दो कड़ियाँ मानी जाती हैं — एक कन्नौज के गहडवाल वंश से, और दूसरी दक्षिण भारत के राष्ट्रकूटों से।
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भारत की आज़ादी के समय क्षेत्रफल की दृष्टि से मारवाड़ राजस्थान की सबसे विशाल रियासत थी।
राव सीहा — वंश के आदिपुरुष
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राव सीहा को राजस्थान में राठौड़ों का मूल पुरुष माना जाता है; परंपरा इन्हें कन्नौज-नरेश गहडवाल जयचन्द की वंश-परंपरा से जोड़ती है।
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कहा जाता है कि पालीवाल ब्राह्मण समुदाय को सहायता पहुँचाने के उद्देश्य से ये कन्नौज छोड़कर मारवाड़ आ बसे।
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इनकी राजधानी खेड़ (वर्तमान बाड़मेर) थी।
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इनकी स्मृति में बनी छतरी पाली के बीठू गाँव में स्थित है।
राव धूहड़
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इन्होंने कुलदेवी नागणेची माता की प्रतिमा कर्नाटक क्षेत्र से लाकर बाड़मेर के नागाणा गाँव में मंदिर स्थापित करवाया।
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प्रसिद्ध लोकदेवता पाबूजी इनके छोटे भाई धाँधल के पुत्र थे।
राव मल्लीनाथ
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इनकी राजधानी मेवानगर (बाड़मेर) थी।
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पश्चिमी राजस्थान में मल्लीनाथ जी को लोकदेवता के रूप में पूजा जाता है।
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इन्हीं के नाम पर बाड़मेर क्षेत्र 'मालाणी' कहलाता है।
परंपरा के अनुसार गणगौर पर्व पर 'गींदोली' के गीत गाए जाते हैं।
मल्लीनाथ के बाद के प्रारंभिक शासक
राव मल्लीनाथ के पश्चात कुछ पीढ़ियों तक राठौड़ सत्ता छोटे-छोटे ठिकानों में बँटी रही और सतत संघर्ष के दौर से गुज़रती रही। इस कड़ी में राव आस्थान (जिन्होंने पाली-खेड़ क्षेत्र को सुदृढ़ किया, पर दिल्ली सल्तनत के शासक जलालुद्दीन खिलजी से युद्ध में मारे गए), तथा इसके बाद कान्हा, राव सोनगजी, राव दूहड़ (द्वितीय) व राव वीरमदेव जैसे शासक आते हैं, जिन्होंने मंडोर क्षेत्र में राठौड़ी सत्ता को क्रमशः विस्तार दिया। इन्हीं वीरमदेव के पुत्र राव चूण्डा को मारवाड़ का पहला सुदृढ़ एवं प्रभावी शासक माना जाता है, जिन्होंने राजधानी को मंडोर स्थानांतरित किया।
राव चूण्डा (1394–1423 ई.)
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मंडौर के प्रतिहार शासक ने अपनी पुत्री का विवाह चूण्डा से किया और दहेज-स्वरूप मंडौर क्षेत्र सौंप दिया; इस प्रकार राठौड़ों की राजधानी अब मंडौर बन गई।
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इनकी रानी चाँद कंवर के नाम पर जोधपुर में चाँद बावड़ी बनवाई गई।
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सन् 1423 में पूगल (बीकानेर क्षेत्र) के भाटी सरदारों ने छल से इनकी हत्या कर दी।
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चूण्डा ने अपने छोटे पुत्र कान्हा को गद्दी सौंपी, जिससे नाराज़ होकर बड़ा पुत्र रणमल मेवाड़ चला गया और अपनी बहन हंसाबाई का विवाह मेवाड़ के राणा लाखा से करवाया। आगे चलकर मेवाड़ की सैन्य सहायता से ही रणमल मारवाड़ की गद्दी पर बैठे।
राव जोधा (1438–1489 ई.)
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रणमल के पुत्र जोधा ने 1438 में चित्तौड़ में पिता की हत्या के बाद कुछ समय जंगलों में बिताकर अपनी शक्ति संगठित की, और 1453 की आँवल-बाँवल संधि के ज़रिए मंडौर पुनः प्राप्त किया।
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1459 में जोधपुर नगर की नींव रखी गई। चिड़ियाटूंक पहाड़ी पर मेहरानगढ़ दुर्ग का निर्माण शुरू हुआ — दुर्ग की नींव रणमल की धर्म-बहन करणी माता ने रखी थी, और 1460 में दुर्ग परिसर में चामुण्डा माता का मंदिर बनवाया गया।
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जोधा ने दिल्ली सल्तनत के शासक बहलोल लोदी की सेना को युद्ध में परास्त किया।
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इतिहासकार डॉ. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा इन्हें जोधपुर का पहला प्रतापी शासक मानते हैं।
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इनकी रानी जसमादे ने जोधपुर में राणीसर तालाब बनवाया।
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जोधा के पुत्र बीका ने आगे चलकर बीकानेर रियासत की स्थापना की।
राव मालदेव (1531–62 ई.)
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मालदेव का जन्म 5 दिसंबर 1511 को हुआ; इनकी माता पद्मा कुमारी सिरोही के जगमाल देवड़ा की पुत्री थीं।
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विश्वेश्वरनाथ रेऊ, गौरीशंकर हीराचन्द ओझा और गोपीनाथ शर्मा जैसे इतिहासकारों का मानना है कि मालदेव अपने पिता राव गांगा की हत्या करके ही सत्ता में आए।
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गद्दी संभालते समय इनके अधीन केवल जोधपुर और सोजत (जहाँ राजतिलक हुआ) थे, परंतु आगे चलकर विस्तारवादी नीति अपनाते हुए इन्होंने 52 युद्ध लड़कर कुल 58 परगनों पर अधिकार जमाया।
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प्रमुख विजयें — 1533 में जैसलमेर के भाटियों को हराकर फलौदी, 1535 में बौलत खाँ को हराकर नागौर, 1536 में सीरवियों को हराकर बिलाड़ा, 1538 में डूंगर सिंह को हराकर सिवाणा जीता। 1539 में वीर सीधल को पराजित कर भाद्राजुण व रायपुर पर कब्ज़ा किया, और सिकंदर खाँ को हराकर जालौर पर अधिकार जमाया। पिता गांगा के शासनकाल में भी सोजत व सेवकी के युद्धों में इन्होंने विजय प्राप्त की थी।
पाहेबा/साहेबा का युद्ध (1541 ई.) — मालदेव बनाम जैतसी (बीकानेर)
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युद्ध में जैतसी की मृत्यु हुई और मालदेव विजयी रहे, जिससे बीकानेर पर उनका अधिकार हो गया। उन्होंने कूम्पा को बीकानेर का प्रशासक नियुक्त किया। पराजित पक्ष के उत्तराधिकारी कल्याणमल ने एक हाथी को लेकर हुए विवाद के बाद दिल्ली के शासक शेरशाह सूरी से सहायता माँगी।
मालदेव और हुमायूँ के संबंध
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चौसा तथा कन्नौज के युद्धों में शेरशाह से पराजित होने के बाद हुमायूँ राजस्थान से गुज़र रहा था। जोगी तीर्थ नामक स्थान से उसने मीर समंद, रायमल सोनी और अतका खाँ — इन तीन दूतों को मालदेव के पास सहायता-याचना के लिए भेजा।
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मालदेव ने बीकानेर क्षेत्र और सैन्य सहायता का आश्वासन दिया।
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परंतु हुमायूँ को मालदेव की नीयत पर संदेह हुआ, और अपने पुस्तकालयाध्यक्ष मुल्ला सुर्ख की सलाह पर वह सिंध (वर्तमान पाकिस्तान) की ओर चला गया।
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वहाँ उसने अमरकोट के शासक वीरसाल सोढ़ा के यहाँ शरण ली।
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इतिहासकारों का मानना है कि यदि उस समय मालदेव और हुमायूँ परस्पर समझ बना पाते, तो शेरशाह के विरुद्ध गठबंधन बनाकर भारत से अफगान सत्ता को समाप्त किया जा सकता था।
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आगे चलकर अकबर के समय जो मुग़ल-राजपूत संबंध विकसित हुए, उनकी नींव शायद इसी दौर में पड़ सकती थी।
मालदेव–शेरशाह सूरी संघर्ष: गिरी सुमेल / जैतारण का युद्ध (1544 ई.)
युद्ध के दोनों पक्ष — मालदेव (सेनापति कूम्पा व जैता) बनाम शेरशाह सूरी (सहयोगी: कल्याणमल-बीकानेर, वीरमदेव-मेड़ता/नागौर)।
संघर्ष के प्रमुख कारण:
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दोनों ही शासकों की विस्तारवादी महत्वाकांक्षाएँ टकरा रही थीं।
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मालदेव का बढ़ता राज्य दिल्ली सल्तनत की सीमाओं को छूने लगा था, जो शेरशाह के लिए चिंता का विषय था।
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हुमायूँ को सुरक्षित निकल जाने देने और उसकी सहायता का प्रयास करने के कारण शेरशाह मालदेव से नाराज़ था।
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कल्याणमल और वीरमदेव जैसे राठौड़-विरोधी सामंतों का साथ पाकर शेरशाह ने राठौड़ों में फूट का लाभ उठाने की रणनीति अपनाई।
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शेरशाह की चतुराई-भरी रणनीति के चलते मालदेव युद्धक्षेत्र से जोधपुर लौट गए, जबकि जैता और कूम्पा ने डटकर मुकाबला जारी रखा। अंततः जलाल खाँ जलवानी की मदद से शेरशाह विजयी हुआ, पर इतनी कठिन लड़ाई के बाद उसने स्वयं कहा था कि 'मुट्ठी भर बाजरे के लिए वह हिन्दुस्तान की बादशाहत खो बैठता।' उल्लेखनीय है कि शेरशाह के पास लगभग 80,000 सैनिक थे, जबकि जैता-कूम्पा की सेना मात्र 12,000 के आसपास थी।
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इसके बाद मालदेव बाड़मेर की पहाड़ियों में स्थित सिवाणा चले गए, जो राठौड़ों के लिए परंपरागत शरणस्थली रहा है, और शेरशाह ने जोधपुर पर कब्ज़ा कर लिया।
मालदेव और मेवाड़ के संबंध
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खानवा के युद्ध के समय मारवाड़ के युवराज के रूप में इन्होंने राणा सांगा का साथ दिया था।
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1533 में गुजरात के बहादुरशाह के विरुद्ध विक्रमादित्य की सहायता की।
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शुरुआत में बनवीर के विरुद्ध उदयसिंह का साथ दिया, परंतु बाद में उदयसिंह से मतभेद होने पर हरमाड़ा के युद्ध में उदयसिंह के विरोधी अजमेर के हाजी खाँ पठान का समर्थन किया।
रानी उमादे
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जैसलमेर-नरेश लूणकरण भाटी की पुत्री उमादे, दासी भारमली से जुड़े किसी प्रसंग के कारण मालदेव से रुष्ट हो गई थीं, जिस कारण इन्हें 'रूठी रानी' कहा जाता है। इन्होंने अपने जीवन का कुछ समय तारागढ़ किले में और बाद का समय राजसमंद के केलवा गाँव में बिताया।
मालदेव के समकालीन विद्वान
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आसानन्द — इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं 'उमादे भटियाणी रा कवित', 'बाघा भारमली का दूहा' तथा 'गोगाजी री पेढी'। ये स्वयं पाहेबा के युद्ध में भी शामिल हुए थे।
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ईसरदासजी — इनकी रचनाओं में 'हाला झाला री कुंडलिया' (सूर सतसई), 'देवीयाण' और 'हरिरस' प्रमुख हैं। पश्चिमी राजस्थान में इन्हें लोकदेवता माना जाता है।
मालदेव के निर्माण-कार्य
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मेड़ता, रीयां (नागौर), सोजत (पाली) और पोकरण (जैसलमेर) में इन्होंने कई दुर्गों का निर्माण करवाया।
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जोधपुर नगर के चारों ओर परकोटा बनवाया।
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इनकी रानी स्वरूपदे ने मंडौर में स्वरूपसागर तालाब (जिसे 'बहूजी रो तालाब' भी कहा जाता है) का निर्माण करवाया।
प्राप्त उपाधियाँ
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हिन्दू बादशाह
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हशमत वाला राजा
फ़ारसी इतिहासकार निज़ामुद्दीन की कृति 'तबकात-ए-अकबरी' तथा फ़रिश्ता की 'तारीख़-ए-फ़रिश्ता' में मालदेव को उस समय के हिन्दुस्तान का सबसे शक्तिशाली शासक बताया गया है।
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7 नवंबर 1562 को मालदेव का देहांत हुआ। अपने बड़े पुत्र रामसिंह से अप्रसन्न होकर उन्होंने उसे राज्य-निष्कासित कर दिया, उदयसिंह को भी उत्तराधिकारी नहीं बनाया, और तीसरे पुत्र चन्द्रसेन को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया — जिससे नाराज़ रामसिंह व उदयसिंह अकबर की शरण में चले गए।
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