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नाडोल और जालोर के चौहान वंश का इतिहास

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By NotesMind
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राजस्थान का इतिहास केवल राजाओं की गाथा नहीं, बल्कि स्वाभिमान की रक्षा के लिए किए गए बलिदानों का प्रमाण है। नाडोल के चौहान और जालोर के सोनगरा चौहान ने मध्यकालीन भारत में दिल्ली सल्तनत के विस्तारवाद को कड़ी चुनौती दी। इस लेख में हम इन दोनों शाखाओं के उदय, विस्तार और अलाउद्दीन खिलजी के साथ हुए ऐतिहासिक युद्धों का विस्तृत विश्लेषण करेंगे।


1. नाडोल के चौहान वंश की स्थापना (Chauhans of Nadol)

नाडोल (पाली जिला) चौहानों की सबसे प्राचीन और पहली शाखा मानी जाती है, जिसने सांभर (सपादलक्ष) से अलग होकर अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाया।

संस्थापक: लक्ष्मण चौहान (960 ई.)

  • मूल: लक्ष्मण चौहान सांभर के राजा वाक्पतिराज के पुत्र थे।

  • उपलब्धियां: इन्होंने नाडोल में आशापुरा माता (चौहानों की कुलदेवी) के भव्य मंदिर का निर्माण करवाया।

  • सामरिक शक्ति: नाडोल शाखा ने गुजरात के चालुक्यों और गजनवी के आक्रमणों का डटकर सामना किया।

नाडोल के प्रमुख ऐतिहासिक शासक

  1. अहिल चौहान (1025 ई.): जब महमूद गजनवी सोमनाथ मंदिर को लूटने जा रहा था, तब अहिल ने उसकी सेना को चुनौती दी। यह शौर्य की एक मिसाल है।

  2. पृथ्वीपाल: इन्होंने गुजरात के शासक कर्ण चालुक्य को युद्ध में पराजित किया।

  3. कल्हण: इन्होंने 1178 ई. में मुहम्मद गौरी के विरुद्ध कायदरा (आबू) के युद्ध में गुजरात के मूलराज द्वितीय की सहायता की थी।

नोट: 1205 ई. के आसपास, नाडोल के शासक सामंत सिंह के समय यह शाखा जालोर के चौहानों में विलीन हो गई।


2. जालोर के सोनगरा चौहान (Sorigara Chauhans of Jalore)

जालोर का किला 'स्वर्णगिरी' पहाड़ी पर स्थित होने के कारण यहाँ के चौहान 'सोनगरा चौहान' कहलाए।

जालोर राज्य की स्थापना: कीर्तिपाल चौहान (1181 ई.)

  • उपाधि: प्रसिद्ध इतिहासकार मुहणोत नैणसी ने कीर्तिपाल को "कीतू: एक महान राजा" कहा है।

  • स्थापना: कीर्तिपाल ने परमार शासकों को पराजित कर जालोर (जाबालिपुर) पर अधिकार किया।

जालोर के अन्य नाम और महत्व

  • प्राचीन नाम: जाबालिपुर (महर्षि जाबालि की तपोभूमि)।

  • किले के नाम: सुवर्णगिरी, कंचनगिरी और सोनगढ़।

  • प्रशासनिक विकास: समरसिंह के काल में किले की प्राचीर और शस्त्रागार का निर्माण हुआ।


3. कान्हड़देव चौहान (1305–1311 ई.): जालोर का अंतिम नायक

कान्हड़देव जालोर के सबसे शक्तिशाली और प्रसिद्ध शासक थे। उनके शासनकाल में दिल्ली सल्तनत के साथ निर्णायक संघर्ष हुआ।

अलाउद्दीन खिलजी के साथ संघर्ष के कारण

  1. रास्ता विवाद: 1299 ई. में खिलजी की सेना जब गुजरात अभियान पर जा रही थी, तब कान्हड़देव ने उन्हें अपने राज्य से रास्ता देने से मना कर दिया।

  2. मंगोल शरणार्थी: हम्मीर देव की भांति कान्हड़देव का भी विद्रोही मंगोलों के प्रति उदार रवैया।

  3. साम्राज्यवादी नीति: अलाउद्दीन खिलजी दक्षिण भारत विजय के लिए जालोर और सिवाना के किलों को जीतना अनिवार्य मानता था।


4. सिवाना और जालोर के ऐतिहासिक युद्ध (The Great Siege)

I. सिवाना का युद्ध (1308 ई.)

  • सिवाना का महत्व: इसे 'जालोर दुर्ग की कुंजी' कहा जाता है। यहाँ का शासक कान्हड़देव का भतीजा शीतलदेव था।

  • युद्ध: अलाउद्दीन की सेना ने विश्वासघाती भावले पंवार की मदद से किले के जल स्रोत (भांडेलाव तालाब) को अपवित्र कर दिया।

  • परिणाम: शीतलदेव वीरगति को प्राप्त हुए और अलाउद्दीन ने सिवाना का नाम बदलकर 'खैराबाद' रख दिया।

II. जालोर का युद्ध (1311 ई.)

  • मुख्य कारण: खिलजी की सेना का लगातार दबाव और राजपूतों का स्वाभिमान।

  • विश्वासघात: कान्हड़देव के सेनापति बीका दहिया ने लालच में आकर किले का गुप्त रास्ता सुल्तान को बता दिया।

  • साका: 1311 ई. में कान्हड़देव और उनके पुत्र वीरमदेव लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। रानी जैतलदे के नेतृत्व में जौहर हुआ।

  • परिणाम: जालोर पर खिलजी का अधिकार हो गया और इसका नाम बदलकर 'जलालाबाद' कर दिया गया। सुल्तान ने यहाँ 'तोपखाना मस्जिद' (अलाई मस्जिद) का निर्माण करवाया।


5. साहित्यिक एवं सांस्कृतिक स्रोत (Exam Special)

कान्हड़देव के शौर्य की जानकारी हमें निम्नलिखित ग्रंथों से मिलती है:

ग्रंथ का नाम लेखक महत्व
कान्हड़दे प्रबंध पद्मनाभ जालोर युद्ध का सबसे प्रामाणिक विवरण।
वीरमदेव सोनगरा री वात पद्मनाभ वीरमदेव और शहजादी फिरोजा की कथा का उल्लेख।
नैणसी री ख्यात मुहणोत नैणसी चौहानों की वंशावली और कीर्तिपाल का वर्णन।
तारीख-ए-फरिश्ता फरिश्ता खिलजी के आक्रमण का मुस्लिम दृष्टिकोण।

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निष्कर्ष (Conclusion)

नाडोल और जालोर के चौहानों का इतिहास राजस्थान की गौरवशाली परंपरा का प्रतीक है। जहाँ लक्ष्मण चौहान ने एक नई शाखा की नींव रखी, वहीं कान्हड़देव ने अपने हठ और वीरता से दिल्ली सल्तनत को हिला दिया। हालांकि विश्वासघात ने युद्ध का परिणाम बदल दिया, लेकिन सोनगरा चौहानों का स्वाभिमान आज भी इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।

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