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राजस्थान की लोक कला (Rajasthan Folk Art): प्रमुख लोककलाएँ, विशेषताएँ

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By NotesMind
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राजस्थान की 'रंगीली' संस्कृति का प्राण यहाँ की लोक कलाएँ (Folk Arts) हैं। ये कलाएँ केवल सौंदर्य का साधन नहीं, बल्कि ग्रामीण राजस्थान की आस्था, सामाजिक परंपराओं और लोक कथाओं का जीवंत दस्तावेज़ हैं। चाहे वह भीलवाड़ा की 'फड़' हो या पाली की 'मेहंदी', हर कला की अपनी एक ऐतिहासिक पहचान है। RPSC, RAS, REET और Patwari जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में राजस्थान की लोक कलाओं से 2-3 प्रश्न निश्चित रूप से पूछे जाते हैं।


1. सांझी कला (Sanjhi Art): कुंवारी कन्याओं की आस्था

सांझी मुख्य रूप से माता पार्वती का प्रतीक मानी जाती है।

  • उद्देश्य: कुंवारी कन्याएं अच्छे वर और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए इसकी पूजा करती हैं।

  • समय: पितृपक्ष (आश्विन कृष्ण एकम से अमावस्या तक) के दौरान इसे दीवारों पर गोबर से उकेरा जाता है।

  • विशेष तथ्य: उदयपुर का मछंदरनाथ मंदिर 'सांझी के मंदिर' के रूप में प्रसिद्ध है। वहीं, नाथद्वारा में 'केले की सांझी' लोकप्रिय है।


2. मांडना (Mandana Art): आंगन की सजावट

मांडना राजस्थान की सबसे प्राचीन लोक चित्रण कला है, जिसे चॉक और गेरू से बनाया जाता है।

  • प्रमुख प्रतीक: * विवाह: गणेश जी, स्वास्तिक और चौक।

    • पुत्र जन्म: मोर, कलश और टोकरी।

    • दीपावली: लक्ष्मी जी के पग (पगलिया)।

  • महत्वपूर्ण: तीर्थ यात्रा से लौटने पर घर के बाहर 'पथवारी' और 'पुष्कर पेड़ी' का मांडना विशेष रूप से बनाया जाता है।


3. फड़ चित्रकला (Phad Painting): लोक देवताओं की गाथा

फड़, कपड़े पर लोक देवताओं के जीवन को चित्रित करने की अद्भुत कला है।

  • केंद्र: शाहपुरा (भीलवाड़ा)

  • प्रमुख कलाकार: श्रीलाल जोशी और शांतिलाल जोशी। (महिला कलाकार: पार्वती जोशी)

  • प्रक्रिया: भोपे (लोक गायक) रावणहत्था या जंतर वाद्य यंत्र के साथ फड़ का वाचन करते हैं।

  • महत्वपूर्ण तथ्य: * देवनारायण जी की फड़: सबसे लंबी और सबसे पुरानी फड़, जिस पर डाक विभाग द्वारा टिकट जारी किया गया है।

    • पाबूजी की फड़: राजस्थान की सबसे लोकप्रिय फड़।


4. कावड़ कला (Kavad Art): चलता-फिरता लकड़ी का मंदिर

कावड़ लकड़ी से निर्मित एक बहुआयामी मंदिरनुमा ढांचा होता है, जिसमें कई द्वार होते हैं।

  • उद्गम स्थल: बासी गाँव (चित्तौड़गढ़)।

  • प्रमुख शिल्पकार: मांगीलाल मिस्त्री

  • उपयोग: कावड़िया भाट इसे घर-घर जाकर खोलते हैं और इसमें चित्रित कथाओं का वाचन करते हैं। इसे 'चलता-फिरता देवघर' भी कहा जाता है।


5. कठपुतली कला (Puppetry): राजस्थान का पारंपरिक मनोरंजन

कठपुतली 'अड़ू' की लकड़ी से बनाई जाती है और इसमें धागों का उपयोग होता है।

  • मुख्य केंद्र: उदयपुर (भारतीय लोक कला मण्डल)।

  • प्रसिद्ध नाटक: अमर सिंह राठौड़, सिंहासन बत्तीसी और पृथ्वीराज-संयोगिता।

  • अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि: 1965 में रोमानिया में राजस्थान के कलाकारों ने विश्व स्तर पर प्रथम स्थान प्राप्त किया था।


6. अन्य महत्वपूर्ण लोक कलाएँ (Quick Glance)

लोक कला मुख्य केंद्र / विशेषता परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण
पाने कागज पर देवताओं के चित्र श्रीनाथजी का पाना (24 श्रृंगार) सबसे कलात्मक
मेहंदी सोजत (पाली) GI Tag प्राप्त (भौगोलिक संकेतक)
गोदना आदिवासी समाज शरीर पर स्थायी अलंकरण (टैटू)
बेवाण लकड़ी का छोटा मंदिर इसे 'विमान' भी कहा जाता है
व्हील मिट्टी का महलनुमा ढांचा पश्चिमी राजस्थान के घरों में सामान रखने हेतु

7. परीक्षा के लिए 'Golden Points' (Quick Revision)

  • फड़ चित्रकला का मुख्य वंश - शाहपुरा का जोशी परिवार

  • सोजत की मेहंदी को विश्व स्तर पर पहचान मिली है और यह अपनी लाली के लिए प्रसिद्ध है।

  • कठपुतली निर्माण में मुख्य रूप से नट जाति के लोग कुशल होते हैं।

  • सांझी को राजस्थान के अलग-अलग क्षेत्रों में 'संध्या' या 'हंज्या' भी कहा जाता है।

  • देवताओं के पाने कागज पर बने चित्र होते हैं जिन्हें दीपावली या त्योहारों पर पूजा जाता है।

 

8. लोक कलाओं का दार्शनिक और सामाजिक आधार

राजस्थान में लोक कला केवल मनोरंजन नहीं है। यह 'बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय' की भावना पर आधारित है। यहाँ की कलाएँ मिट्टी से जुड़ी हैं। उदाहरण के लिए, मांडना केवल फर्श सजाना नहीं है, बल्कि यह घर में सकारात्मक ऊर्जा के प्रवेश का मार्ग माना जाता है।


9. फड़ चित्रकला (Phad Painting): भीलवाड़ा का गौरव

विस्तृत विवरण:

फड़ का अर्थ होता है 'पढ़ना' या 'वाचना'। यह कपड़े पर निर्मित एक स्क्रॉल पेंटिंग है।

  • निर्माण प्रक्रिया: सबसे पहले हाथ से बुने हुए सूती कपड़े (रेजी) को चावल के मांड और गोंद से कड़ा किया जाता है। फिर उसे पत्थर से घिसकर चिकना बनाया जाता है।

  • रंगों का चयन: इसमें केवल प्राकृतिक रंगों का प्रयोग होता है। केसरिया रंग शौर्य के लिए, हरा रंग हरियाली और समृद्धि के लिए, और नीला रंग देवताओं (जैसे कृष्ण) के लिए।

  • प्रसिद्ध फड़:

    1. पाबूजी की फड़: यह सबसे लोकप्रिय है। ऊँटों के बीमार होने पर 'नायक' जाति के भोपे इसका वाचन करते हैं।

    2. देवनारायण जी की फड़: गुर्जर जाति के भोपे इसका वाचन 'जंतर' वाद्य के साथ करते हैं। यह आकार में सबसे बड़ी होती है।

    3. भैंसासुर की फड़: इसका वाचन नहीं किया जाता, केवल दर्शन किए जाते हैं। इसे बावरी जाति के लोग चोरी पर जाने से पहले शकुन के रूप में पूजते हैं।

    4. रामदला-कृष्णदला की फड़: इसका वाचन दिन में किया जाता है (अन्य फड़ों का वाचन रात में होता है)।


10. मांडना (Mandana): ज्यामितीय सौंदर्य

राजस्थान के गाँवों में आज भी महिलाएं बिना किसी स्केल या सांचे के अद्भुत ज्यामितीय आकृतियाँ बनाती हैं।

  • तकनीकी पक्ष: इसे 'खड़िया' (सफेद मिट्टी) और 'हिरमिच' (लाल मिट्टी) से बनाया जाता है।

  • क्षेत्रीय विविधता: * हाड़ौती के मांडने: यहाँ शेर, हाथी और शिकार के दृश्य अधिक मिलते हैं।

    • शेखावाटी के मांडने: यहाँ बेल-बूटों और फूल-पत्तियों की प्रधानता रहती है।

  • प्रमुख आकृतियाँ: 'सतिया' (स्वास्तिक), 'पगल्या' (लक्ष्मी के पैर), 'ताम' (विवाह का मांडना), और 'भरड़ी' (लोक देवी का चित्र)।


11. कावड़ और बेवाण: लकड़ी की बेमिसाल कलाकारी

चित्तौड़गढ़ का बासी गाँव लकड़ी की कला का मक्का माना जाता है।

  • कावड़ (The Traveling Shrine): कावड़ में कई कपाट (दरवाजे) होते हैं। जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ती है, भाट (कथावाचक) एक-एक कपाट खोलता जाता है। अंत में 'राम-लक्ष्मण-सीता' की मूर्तियाँ प्रकट होती हैं।

  • बेवाण (Miniature Wooden Temple): इसे 'विमान' भी कहते हैं। जलझूलनी एकादशी के दिन ठाकुर जी की मूर्तियों को बेवाण में बिठाकर जलाशय तक ले जाया जाता है। इसे 'मिनी मिनीएचर टेम्पल' भी कहा जाता है।


12. कठपुतली (Puppetry): धागों का जादू

कठपुतली शब्द 'काष्ठ' (लकड़ी) और 'पुतली' (गुड़िया) से बना है।

  • इतिहास: माना जाता है कि विक्रमादित्य के सिंहासन बत्तीसी की कहानियों से इसका प्रारंभ हुआ। अमर सिंह राठौड़ के खेल के माध्यम से मुगलों और राजपूतों के शौर्य की गाथा सुनाई जाती है।

  • निर्माण: इसे 'अड़ू' की लकड़ी से बनाया जाता है क्योंकि यह हल्की होती है। इसमें चेहरों को तीखे नैन-नक्श के साथ बनाया जाता है।

  • भारतीय लोक कला मंडल (उदयपुर): देवीलाल सामर ने इस संस्था के माध्यम से कठपुतली कला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुँचाया।


13. अन्य लघु लोक कलाएँ (Brief but Important)

  • पाने (Paper Art): कागज पर बने चित्र। श्रीनाथजी का पाना सबसे प्रसिद्ध है जिसमें 24 श्रृंगार दिखाए जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में दीपावली पर लक्ष्मी जी के पाने और गणेश जी के पाने पूजे जाते हैं।

  • व्हील (Mud Palace): पश्चिमी राजस्थान (जैसलमेर, बाड़मेर) में महिलाएं मिट्टी से छोटे-छोटे अलमारीनुमा महल बनाती हैं जिनमें घरेलू सामान रखा जाता है। यह 'मृण शिल्प' का उत्कृष्ट उदाहरण है।

  • गोदना (Tattooing): भील और गरासिया जनजातियों में गोदना अनिवार्य माना जाता है। महिलाएं अपने हाथ पर अपने पति का नाम या धार्मिक प्रतीक गुदवाती हैं।


14. आधुनिक काल में लोक कलाओं की चुनौतियाँ और संरक्षण

आज के डिजिटल युग में ये कलाएँ लुप्त हो रही हैं।

  • जीआई टैग (GI Tag): सोजत की मेहंदी और फड़ पेंटिंग जैसे उत्पादों को भौगोलिक संकेतक मिलने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में इनकी मांग बढ़ी है।

  • पर्यटन: जयपुर के 'जवाहर कला केंद्र' और 'शिल्पग्राम' (उदयपुर) में इन कलाकारों को मंच प्रदान किया जा रहा है।

  • परीक्षा टिप्स: विद्यार्थियों को याद रखना चाहिए कि कौन सी कला किस जिले से जुड़ी है और उसके मुख्य कलाकार कौन हैं। (जैसे: मांगीलाल मिस्त्री - कावड़, श्रीलाल जोशी - फड़)।


15. राजस्थान की लोक कलाओं पर आधारित एक महत्वपूर्ण तालिका

कला का नाम मुख्य केंद्र प्रसिद्ध कलाकार / जाति
फड़ शाहपुरा (भीलवाड़ा) जोशी परिवार (श्रीलाल जोशी)
कावड़ / बेवाण बासी (चित्तौड़गढ़) खैरादी जाति (मांगीलाल मिस्त्री)
कठपुतली उदयपुर, जयपुर नट और भाट जाति
मेहंदी सोजत (पाली) -
टेराकोटा (मृण शिल्प) मोलेला (राजसमंद) मोहनलाल कुम्हार
ब्लू पॉटरी जयपुर कृपाल सिंह शेखावत
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