राजस्थान की प्राचीन मुद्राएँ और ताम्रपत्र: इतिहास के प्रामाणिक स्रोत
1. राजस्थान में मुद्रा प्रचलन की शुरुआत (Origin of Coinage in Rajasthan)
राजस्थान में नियमित रूप से मुद्राएँ जारी करने का श्रेय सर्वप्रथम चौहान वंश को जाता है। यह इस बात का प्रमाण है कि चौहान काल में एक संगठित और मजबूत अर्थव्यवस्था विकसित हो चुकी थी, जहाँ वस्तु-विनिमय (Barter System) की जगह नकद लेन-देन ने ले ली थी।
चौहान काल की प्रमुख मुद्राएँ
चौहानों ने व्यापार और प्रशासन को सुगम बनाने के लिए विभिन्न धातुओं की मुद्राएँ प्रचलित कीं:
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ताँबे के सिक्के: द्रम्म, विशोपक
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चाँदी के सिक्के: रूपक
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सोने के सिक्के: दीनार
2. रियासतकालीन मुद्राएँ: मेवाड़ का स्वतंत्र आर्थिक ढांचा (Coins of Mewar)
मेवाड़ क्षेत्र में अपनी अलग और विशिष्ट प्रकार की मुद्राएँ प्रचलित थीं, जो मेवाड़ राज्य की स्वतंत्र आर्थिक नीति और संप्रभुता का प्रतीक थीं।
मेवाड़ की प्रमुख मुद्राएँ:
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ताँबे के सिक्के: डिंगला, भिलाड़ी, त्रिशुलिया, भिडरिया और नाथद्वारिया।
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चाँदी के सिक्के: द्रम्म और रूपक।
3. मुगल काल और राजस्थान की मुद्रा व्यवस्था (Mughal Era Coins)
मुगल सम्राट अकबर ने राजपूताना की अर्थव्यवस्था को सीधे मुगल साम्राज्य से जोड़ने का प्रयास किया। इससे राजस्थान में मुद्रा व्यवस्था में कई बदलाव आए।
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एलची सिक्का (Elchi Coin): अकबर ने 1567 ई. में चित्तौड़ विजय के बाद मेवाड़ क्षेत्र में 'एलची' नामक सिक्का चलाया था।
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टकसाल की स्थापना: अकबर ने आमेर (जयपुर) में पहली बार टकसाल (Mint) खोलने की अनुमति दी थी, जिससे स्थानीय स्तर पर मुगल शैली के सिक्के ढाले जाने लगे।
4. अंग्रेजी (ब्रिटिश) काल की मुद्राएँ (British Era Coins in Rajasthan)
अंग्रेजों के आगमन के बाद राजस्थान की रियासतों में ब्रिटिश प्रभाव वाली कई नई मुद्राएँ प्रचलन में आईं।
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कलदार (Kaldar): यह अंग्रेजों के समय का सबसे प्रसिद्ध चाँदी का सिक्का था। 1900 ई. में रियासतों के स्थानीय सिक्कों पर रोक लगाकर पूरे राजपूताना में कलदार का चलन अनिवार्य कर दिया गया।
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ब्रिटिश प्रभाव वाली स्थानीय मुद्राएँ:
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मेवाड़ के स्वरूपशाही सिक्के
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मारवाड़ (जोधपुर) के आलमशाही सिक्के
(इन सिक्कों पर "औरंग आराम दि क्वीन विक्टोरिया" या ब्रिटिश शासकों के नाम अंकित रहते थे, जो ब्रिटिश अधीनता को दर्शाते हैं।)
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5. महत्वपूर्ण पुरातात्विक खोजें (Archaeological Discoveries of Coins)
राजस्थान के विभिन्न पुरातात्विक स्थलों की खुदाई से बड़ी मात्रा में प्राचीन सिक्के मिले हैं, जो उस समय के व्यापारिक केंद्रों को रेखांकित करते हैं:
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रैढ़ (टोंक - Rairh): यहाँ उत्खनन से 3075 चाँदी के पंचमार्क सिक्के (आहत मुद्राएँ) मिले हैं, जिन्हें 'धरण' या 'पाण' कहा जाता था। इनका समयकाल 600 ई.पू. से 200 ई.पू. माना जाता है। इसे प्राचीन भारत का टाटानगर भी कहा जाता है।
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उणियारा / नगर (टोंक): 1871 ई. में कार्लाइल को यहाँ से लगभग 6000 मालव जनपद के सिक्के प्राप्त हुए।
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रंगमहल (हनुमानगढ़): यहाँ से आहत मुद्राएँ और कुषाण कालीन मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं।
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बैराठ सभ्यता (कोटपूतली-बहरोड़): यहाँ से यूनानी शासक मिनांडर की 16 प्रसिद्ध मुद्राएँ मिली हैं।
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गधिया सिक्के (Indo-Sasanian Coins): 10वीं से 11वीं शताब्दी में प्रचलित इंडो-सासानी सिक्कों पर विदेशी प्रभाव स्पष्ट था। स्थानीय लोगों द्वारा इन्हें 'गधिया सिक्के' कहा गया।
6. ताम्रपत्र अभिलेखों का महत्व (Importance of Copper Plates)
ताँबे की छोटी पट्टिकाओं (प्लेट्स) पर उकेरे गए लेखों को ताम्रपत्र (Tamrapatra) कहा जाता है। इनका मुख्य उपयोग राजकीय आदेशों, ब्राह्मणों या मंदिरों को दिए गए भूमि अनुदान (Land Grants) और दान का विवरण सुरक्षित रखने के लिए किया जाता था।
राजस्थान के प्रमुख ताम्रपत्र:
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पुलेव का दान पत्र (679 ई.)
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बौर गुर्जर ताम्रपात्र (978 ई.)
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बीरपुर का दान पत्र
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आहड़ (आइड़) ताम्रपत्र
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मंथनदेव का ताम्रपत्र
(इन ताम्रपत्रों से तत्कालीन कर-व्यवस्था 'लाग-बाग', सामाजिक स्थिति और धार्मिक दान की सटीक जानकारी मिलती है।)
महत्वपूर्ण पुस्तक: তৎকালীন राजपूताना की रियासतों की मुद्राओं का वैज्ञानिक अध्ययन करने के लिए 1893 ई. में वेब (W.W. Webb) ने “द करेंसीज ऑफ राजपूताना” (The Currencies of the Hindu States of Rajputana) नामक पुस्तक लिखी, जो इस विषय का सबसे प्रामाणिक ग्रंथ है।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Revision Table)
| महत्वपूर्ण बिंदु (Key Points) | ऐतिहासिक तथ्य (Historical Facts) |
| पहली बार सिक्के जारी किए | चौहान वंश ने |
| अकबर द्वारा चलाया गया सिक्का | एलची (चित्तौड़ विजय के बाद) |
| सबसे प्रसिद्ध अंग्रेजी सिक्का | कलदार (चाँदी का सिक्का) |
| सर्वाधिक पंचमार्क सिक्के कहाँ मिले? | रैढ़, टोंक (3075 सिक्के) |
| इंडो-सासानी सिक्कों का स्थानीय नाम | गधिया सिक्के |
| पहली टकसाल खोलने की अनुमति | आमेर (अकबर द्वारा) |
| यूनानी शासकों की मुद्राएँ कहाँ से मिलीं? | बैराठ सभ्यता |
निष्कर्ष (Conclusion)
राजस्थान की प्राचीन मुद्राएँ और ताम्रपत्र राज्य की आर्थिक प्रगति, राजनीतिक संप्रभुता और सांस्कृतिक स्थिति को समझने के सबसे पारदर्शी साधन हैं। सिक्कों की धातु (सोना, चाँदी, ताँबा), उनकी आकृति और उन पर अंकित लिपियों से हमें व्यापारिक समृद्धि और विदेशी संपर्कों का ज्ञान होता है। वहीं, ताम्रपत्रों ने तत्कालीन राजस्व प्रणाली को समझने में मदद की है। इतिहास का यह खंड न केवल पुरातात्विक दृष्टि से, बल्कि किसी भी राज्य-स्तरीय प्रतियोगी परीक्षा में सफलता सुनिश्चित करने के लिए भी एक अत्यंत स्कोरिंग विषय है।
Q1. राजस्थान में 'एलची' सिक्का किस शासक ने चलाया था?
उत्तर: एलची सिक्का मुगल सम्राट अकबर ने 1567 ई. में चित्तौड़गढ़ विजय के बाद मेवाड़ क्षेत्र में चलाया था।
Q2. प्राचीन भारत का टाटानगर किसे कहा जाता है और क्यों?
उत्तर: टोंक जिले के 'रैढ़' को प्राचीन भारत का टाटानगर कहा जाता है क्योंकि यहाँ से एशिया का सबसे बड़ा सिक्कों का भंडार (3075 पंचमार्क/आहत सिक्के) प्राप्त हुआ है।
Q3. 'द करेंसीज ऑफ राजपूताना' पुस्तक के लेखक कौन हैं?
उत्तर: इस प्रसिद्ध पुस्तक के लेखक डब्लू. डब्लू. वेब (W.W. Webb) हैं, जिन्होंने 1893 ई. में राजपूताना की रियासतों के सिक्कों पर यह शोध ग्रंथ लिखा था।
Q4. गधिया सिक्के (Gadhiya Coins) किस काल के माने जाते हैं?
उत्तर: गधिया सिक्के 10वीं से 11वीं शताब्दी के माने जाते हैं। ये मूल रूप से इंडो-सासानी सिक्के थे जिन पर विदेशी प्रभाव था।
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