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राजस्थान की प्रमुख भाषाएँ

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By NotesMind
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राजस्थानी भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि राजस्थान की 'वीर प्रसूता' मिट्टी की धड़कन है। यह वह भाषा है जिसमें मीरां के पद रचे गए, चंदबरदाई ने शौर्य गाथाएं लिखीं और कन्हैयालाल सेठिया ने 'पाथल और पीथल' के माध्यम से मातृभूमि का गुणगान किया। भाषाई दृष्टि से यह एक स्वतंत्र और समृद्ध भाषा है, जिसकी जड़ें हज़ारों साल पुरानी भारतीय आर्य संस्कृति में गहराई तक धंसी हुई हैं।


भाग 1: राजस्थानी भाषा का उद्भव और भाषाई वर्गीकरण (Phylogeny)

राजस्थानी भाषा का विकास रातों-रात नहीं हुआ, बल्कि यह एक क्रमिक भाषाई विकास (Evolutionary Process) का परिणाम है।

1.1 प्राचीन जड़ें (Sanskrit to Apabhraṃśa)

भारतीय उपमहाद्वीप की अधिकांश भाषाओं की जननी वैदिक संस्कृत है। राजस्थानी का विकास मार्ग निम्नलिखित चरणों से गुजरा है:

  • वैदिक संस्कृत (1500-500 BC): देववाणी, जिससे सभी आर्य भाषाओं का जन्म हुआ।

  • पाली (500 BC - 1 AD): भगवान बुद्ध के उपदेशों की भाषा।

  • प्राकृत (1 AD - 500 AD): आम जनमानस की भाषा। इसमें 'शौरसेनी प्राकृत' से राजस्थानी का संबंध जुड़ता है।

  • अपभ्रंश (500 AD - 1000 AD): प्राकृत के विकृत रूप को अपभ्रंश कहा गया। राजस्थानी के संदर्भ में 'मरु-गुर्जरी अपभ्रंश' या 'गुर्जर अपभ्रंश' सबसे महत्वपूर्ण है।

1.2 विद्वानों के विभिन्न मत (Academic Perspectives)

राजस्थानी की उत्पत्ति को लेकर भाषाविदों में स्वस्थ मतभेद रहे हैं:

  1. डॉ. एल.पी. टेस्सीटोरी: इनके अनुसार राजस्थानी की उत्पत्ति 'शौरसेनी अपभ्रंश' से हुई है।

  2. मोतीलाल मेनारिया और के.एम. मुंशी: इनका मानना है कि राजस्थानी 'गुर्जर अपभ्रंश' से निकली है। यह मत वर्तमान में सबसे सटीक माना जाता है क्योंकि 11वीं सदी तक राजस्थान और गुजरात की भाषा काफी हद तक समान थी।

  3. जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन: उन्होंने इसे 'नागर अपभ्रंश' से संबंधित बताया।


भाग 2: राजस्थानी भाषा का कालक्रम (Timeline of Development)

राजस्थानी भाषा के विकास को तीन मुख्य कालखंडों में विभाजित किया जा सकता है:

2.1 प्राचीन काल (1050 ई. – 1450 ई.)

यह वह काल था जब अपभ्रंश से राजस्थानी अलग होना शुरू हुई थी। जैन कवियों ने इस दौरान 'रास' और 'फागु' साहित्य की रचना की। इस समय की भाषा को 'पुरानी राजस्थानी' या 'मरु-भाषा' कहा जाता है।

2.2 मध्यकाल (1450 ई. – 1850 ई.) – "स्वर्ण युग"

यह राजस्थानी साहित्य और भाषा का चरमोत्कर्ष था।

  • भक्ति धारा: मीरां बाई, दादू दयाल और चरणदास जैसे संतों ने इसे जन-जन की भाषा बनाया।

  • वीर गाथा: डिंगल शैली में रासो ग्रंथों की रचना हुई।

  • स्वतंत्रता: 16वीं शताब्दी तक आते-आते यह गुजराती से पूरी तरह अलग होकर एक स्वतंत्र व्याकरणिक पहचान बना चुकी थी।

2.3 आधुनिक काल (1850 ई. – वर्तमान)

सूर्यमल मिश्रण जैसे कवियों ने इस काल में आधुनिक राजस्थानी की नींव रखी। आज यह भाषा संवैधानिक मान्यता (8वीं अनुसूची) के लिए संघर्षरत है।


भाग 3: राजस्थानी की प्रमुख बोलियाँ (Dialectical Geography)

राजस्थान की भौगोलिक विविधता के कारण यहाँ कहा जाता है— "कोस-कोस पर पानी बदले, पाँच कोस पर बाणी।"

3.1 पश्चिमी राजस्थानी समूह (Western Rajasthan)

A. मारवाड़ी (Marwari) - द मानक भाषा

यह राजस्थान की सबसे प्रभावशाली बोली है।

  • क्षेत्र: जोधपुर, पाली, नागौर, जालौर, सिरोही, बाड़मेर।

  • साहित्य: जैन साहित्य और मीरां के अधिकांश पद इसी में हैं।

  • विशेषता: इसमें 'ड़' का प्रयोग अधिक होता है (जैसे 'घोड़ा' को 'घोड़ो')।

B. मेवाड़ी (Mewari)

  • क्षेत्र: उदयपुर, चित्तौड़गढ़, राजसमंद।

  • विशेषता: मारवाड़ी के बाद यह दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बोली है। महाराणा कुम्भा द्वारा रचित नाटक इसी बोली में हैं।

C. वागड़ी (Wagdi)

  • क्षेत्र: डूंगरपुर और बांसवाड़ा।

  • विशेषता: इसे 'भीली बोली' भी कहा जाता है। इस पर गुजराती का गहरा प्रभाव है।

D. शेखावाटी (Shekhawati)

  • क्षेत्र: सीकर, झुंझुनू, चूरू। यह मारवाड़ी की एक विशिष्ट उपबोली है।

3.2 पूर्वी राजस्थानी समूह (Eastern Rajasthan)

A. ढूंढाड़ी (Dhundhari)

  • क्षेत्र: जयपुर, दौसा, टोंक।

  • विशेषता: इसमें 'छै' (है) का प्रयोग मुख्य पहचान है। दादू दयाल का साहित्य इसी में है।

B. हाड़ौती (Harauti)

  • क्षेत्र: कोटा, बूंदी, झालावाड़।

  • विशेषता: यह ढूंढाड़ी की ही एक शाखा है लेकिन उच्चारण में काफी अंतर है। सूर्यमल मिश्रण (वंश भास्कर) की रचनाएँ इसी का मिश्रण हैं।

C. मेवाती (Mewati)

  • क्षेत्र: अलवर, भरतपुर।

  • विशेषता: इस पर ब्रजभाषा का प्रभाव स्पष्ट दिखता है। संत चरणदास और सहजोबाई की रचनाएँ इसी में हैं।


भाग 4: साहित्यिक शैलियाँ - डिंगल और पिंगल

राजस्थानी साहित्य को समझने के लिए इन दो शैलियों का ज्ञान अनिवार्य है:

विवरण डिंगल (Dingal) पिंगल (Pingal)
प्रकृति कठोर, ओजस्वी और वीर रस प्रधान। कोमल, मधुर और श्रृंगार रस प्रधान।
मिश्रण मारवाड़ी + अपभ्रंश। ब्रजभाषा + राजस्थानी।
जातिगत संबंध मुख्य रूप से चारण कवियों द्वारा प्रयुक्त। मुख्य रूप से भाट कवियों द्वारा प्रयुक्त।
प्रमुख ग्रंथ पृथ्वीराज राठौड़ की 'वेलि किसन रुक्मणी री'। चंदबरदाई की 'पृथ्वीराज रासो'।

भाग 5: राजस्थानी व्याकरण की अनूठी विशेषताएं

  1. लिंग विधान: अन्य भाषाओं की तुलना में यहाँ निर्जीव वस्तुओं के लिए भी पुल्लिंग और स्त्रीलिंग के कड़े नियम हैं।

  2. सर्वनाम: 'मूँ' (मैं), 'तूँ' (तू), 'अापो' (हम) जैसे शब्द इसकी मौलिकता दर्शाते हैं।

  3. सहायक क्रियाएं: 'है' के स्थान पर 'है', 'छै', 'स' आदि का क्षेत्रीय प्रयोग।

  4. ध्वनि: 'ल' ध्वनि का 'ल़' (Retroflex) के रूप में उच्चारण राजस्थानी की विशिष्ट पहचान है।


भाग 6: वर्तमान चुनौतियाँ और भविष्य

राजस्थानी भाषा विश्व की समृद्धतम भाषाओं में से एक होने के बावजूद आज भी भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में स्थान पाने के लिए तरस रही है।

  • सांस्कृतिक महत्व: राजस्थान की कला, हस्तशिल्प और पर्यटन इसी भाषा के इर्द-गिर्द घूमते हैं।

  • शिक्षा: प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा को शामिल करने से बच्चों का मानसिक विकास बेहतर होता है।


भाग 7: परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण शब्दावली (Glossary for Exams)

  • उद्योतन सूरी: इन्होंने 8वीं शताब्दी में 'कुवलयमाला' ग्रंथ में 18 देशी भाषाओं में 'मरु-भाषा' का उल्लेख किया।

  • कोठारी आयोग: राजस्थानी को एक स्वतंत्र और समृद्ध भाषा के रूप में मान्यता देने की सिफारिश की।

  • साहित्य अकादमी: राजस्थानी को 1973 में एक स्वतंत्र साहित्यिक भाषा के रूप में मान्यता मिली।


निष्कर्ष

राजस्थानी भाषा का इतिहास संघर्ष और स्वाभिमान का इतिहास है। यदि आप प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, तो इन बोलियों के क्षेत्रों और उनके भाषाई मूल को समझना आपके लिए मील का पत्थर साबित होगा। यह लेख आपको न केवल अच्छे अंक दिलाएगा बल्कि राजस्थान की माटी से आपका जुड़ाव भी गहरा करेगा।

 

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