आमेर के सवाई जयसिंह द्वितीय
सवाई जयसिंह द्वितीय एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी शासक थे। उनका शासनकाल राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास का सबसे रचनात्मक काल माना जाता है। उन्होंने न केवल मुगलों की गिरती हुई सत्ता के बीच अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई, बल्कि विज्ञान और नगर नियोजन के क्षेत्र में भारत को वैश्विक मानचित्र पर स्थापित किया।
1. परिचय और प्रारंभिक जीवन (Early Life)
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वास्तविक नाम: विजयसिंह (औरंगजेब ने उनकी वाकपटुता और बुद्धि से प्रभावित होकर उनका नाम 'जयसिंह' और उनके छोटे भाई का नाम 'विजयसिंह' कर दिया)।
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राज्याभिषेक: 1700 ई. में मात्र 11 वर्ष की आयु में।
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शासनकाल: 1700 से 1743 ई. (लगभग 44 वर्ष)।
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वंश: कच्छवाहा राजवंश।
'सवाई' की उपाधि का रहस्य
मुगल सम्राट औरंगजेब ने उन्हें 'सवाई' की उपाधि दी थी। औरंगजेब का मानना था कि वे अपने पूर्वज 'मिर्जा राजा जयसिंह' से भी सवा गुना (1.25 गुना) अधिक चतुर और योग्य हैं। तभी से जयपुर के राजाओं के नाम के आगे 'सवाई' लगाने की परंपरा शुरू हुई।
2. मुगल राजनीति और देबारी समझौता (1708)
औरंगजेब की मृत्यु (1707) के बाद मुगलों के उत्तराधिकार युद्ध में जयसिंह ने आजम शाह का साथ दिया, लेकिन मुअज्जम (बहादुरशाह प्रथम) जीत गया।
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आमेर का खालसा होना: बहादुरशाह ने आमेर पर अधिकार कर लिया और इसका नाम बदलकर 'मोमिनाबाद' रख दिया।
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देबारी समझौता: अपनी सत्ता पुनः प्राप्त करने के लिए जयसिंह ने मेवाड़ के महाराणा अमरसिंह द्वितीय और मारवाड़ के अजीत सिंह के साथ गठबंधन किया। इसी समझौते के तहत जयसिंह ने मेवाड़ की राजकुमारी चंद्र कंवर से विवाह किया।
3. जयपुर शहर की स्थापना: भारत का पेरिस (1727)
सवाई जयसिंह की सबसे बड़ी उपलब्धि 18 नवंबर 1727 को जयपुर नगर की स्थापना थी।
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नगर नियोजक: बंगाली ब्राह्मण पंडित विद्याधर भट्टाचार्य।
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वास्तु शास्त्र: जयपुर को 'ग्रिड सिस्टम' (Grid System) या 'नौ खंडों के सिद्धांत' पर बसाया गया है, जहाँ सड़कें एक-दूसरे को समकोण (90 डिग्री) पर काटती हैं।
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सुरक्षा: शहर को चारों ओर से सात दरवाजों वाले परकोटे से घेरा गया।
4. खगोल विज्ञान और जंतर-मंतर (Astronomical Contributions)
जयसिंह केवल योद्धा नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक थे। उन्होंने पाया कि उस समय की खगोलीय गणनाएँ सटीक नहीं थीं, इसलिए उन्होंने भारत में पाँच वेधशालाओं (Jantar Mantar) का निर्माण करवाया:
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दिल्ली (1724): सबसे पहली वेधशाला।
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जयपुर: सबसे बड़ी वेधशाला (इसे UNESCO विश्व धरोहर में शामिल किया गया है)।
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उज्जैन: प्राचीन खगोलीय महत्व के कारण।
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वाराणसी: गंगा तट पर।
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मथुरा: (अब अस्तित्व में नहीं है)।
खगोलीय ग्रंथ और यंत्र
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जीज मोहम्मद शाही: नक्षत्रों की शुद्ध सारणी तैयार की।
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जयसिंह कारिका: ज्योतिष पर आधारित ग्रंथ।
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यंत्र: सम्राट यंत्र (विश्व की सबसे बड़ी सूर्य घड़ी), जयप्रकाश यंत्र और राम यंत्र।
5. स्थापत्य कला और प्रमुख निर्माण
जयपुर को भव्य बनाने के लिए उन्होंने कई महत्वपूर्ण इमारतों का निर्माण करवाया:
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सिटी पैलेस (City Palace): राजाओं का निवास स्थान, जिसमें 'चन्द्रमहल' प्रमुख है।
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गोविन्द देव जी मंदिर: सवाई जयसिंह भगवान कृष्ण के परम भक्त थे और उन्हें ही जयपुर का वास्तविक राजा मानकर स्वयं उनके दीवान के रूप में शासन करते थे।
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जल महल: मानसागर झील के बीच, शाही स्नान और पक्षी दर्शन के लिए।
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नाहरगढ़ किला: मराठों के आक्रमण से सुरक्षा के लिए इसे 'सुदर्शनगढ़' के नाम से बनाया गया।
6. मराठा संघर्ष और हुरड़ा सम्मेलन (1734)
सवाई जयसिंह के काल में मराठों का राजस्थान में हस्तक्षेप बढ़ गया था।
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हुरड़ा सम्मेलन (17 जुलाई 1734): मराठों के विरुद्ध राजपूत राजाओं को एकजुट करने के लिए भीलवाड़ा में सम्मेलन किया गया, जिसकी योजना जयसिंह ने बनाई थी। हालांकि, आपसी फूट के कारण यह सम्मेलन असफल रहा।
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बूंदी का हस्तक्षेप: जयसिंह द्वारा बूंदी की राजनीति में हस्तक्षेप करने के कारण ही राजस्थान में मराठों का प्रथम प्रवेश हुआ, जो एक बड़ी कूटनीतिक भूल मानी जाती है।
7. अंतिम हिंदू सम्राट और अश्वमेध यज्ञ
सवाई जयसिंह ने प्राचीन भारतीय परंपराओं को पुनर्जीवित किया। 1740 ई. में उन्होंने अश्वमेध यज्ञ करवाया। वे ऐसा करने वाले अंतिम हिंदू शासक थे। इस यज्ञ के पुरोहित पुंडरीक रत्नाकर थे।
8. सामाजिक और धार्मिक सुधार (Social Reforms)
सवाई जयसिंह एक आधुनिक सोच वाले शासक थे:
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सती प्रथा: उन्होंने सती प्रथा को प्रतिबंधित करने के लिए कानून बनाने का प्रयास किया।
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विधवा विवाह: विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए प्रोत्साहित किया।
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ब्राह्मण एकता: ब्राह्मणों के विभिन्न उप-जातियों के बीच भेदभाव मिटाने के लिए उन्होंने एक साथ भोजन करने की परंपरा शुरू की।
9. दरबारी विद्वान और साहित्य
| विद्वान | प्रमुख रचना |
| पुंडरीक रत्नाकर | जयसिंह कल्पद्रुम |
| श्रीकृष्ण भट्ट | राघव गीतं, पद्य मुक्तावली |
| नयनसुख | यूक्लिड की ज्यामिति का अरबी से संस्कृत अनुवाद |
| जगन्नाथ सम्राट | सिद्धांत सम्राट, यंत्र राज |
📊 सवाई जयसिंह द्वितीय: क्विक रिविज़न टेबल (Exam Capsule)
| महत्वपूर्ण तथ्य | विवरण |
| संस्थापक | जयपुर शहर (18 नवंबर 1727) |
| वेधशालाएँ | दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, वाराणसी, मथुरा |
| प्रमुख ग्रंथ | जीज मोहम्मद शाही, जयसिंह कारिका |
| उपाधियाँ | सवाई (औरंगजेब), राजराजेश्वर (मुहम्मदशाह) |
| अंतिम यज्ञ | अश्वमेध यज्ञ (1740) |
| प्रधान वास्तुकार | विद्याधर भट्टाचार्य |
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण 'Key Points' (Must Remember)
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सात मुगल सम्राट: सवाई जयसिंह ने सात मुगल शासकों (औरंगजेब से लेकर मुहम्मदशाह रंगीला तक) का काल देखा था।
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जयबाण तोप: जयगढ़ किले के कारखाने में बनाई गई एशिया की सबसे बड़ी पहियों वाली तोप।
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नाहरगढ़: इसे जयपुर की ओर झाँकता हुआ किला भी कहा जाता है।
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यूनेस्को: जयपुर के 'जंतर-मंतर' को 2010 में और 'जयपुर परकोटा शहर' को 2019 में विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया।
निष्कर्ष (Conclusion)
सवाई जयसिंह द्वितीय का इतिहास एक योद्धा की वीरता और एक वैज्ञानिक की जिज्ञासा का अद्भुत समन्वय है। उन्होंने जयपुर के रूप में भारत को एक ऐसा सुनियोजित शहर दिया जो आज भी विश्व के लिए इंजीनियरिंग का अजूबा है। खगोल विज्ञान में उनके योगदान के कारण ही उन्हें 'भारतीय खगोल विज्ञान का पुनरुद्धारकर्ता' कहा जाता है।
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