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आमेर के ईश्वरीसिंह, माधोसिंह और सवाई प्रतापसिंह

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By NotesMind
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सवाई जयसिंह द्वितीय की मृत्यु के बाद जयपुर रियासत उत्तराधिकार के भीषण संघर्ष और मराठों के बढ़ते हस्तक्षेप की गवाह बनी। इस कालखंड में जयपुर के शासकों को न केवल अपनी सीमाओं की रक्षा करनी पड़ी, बल्कि कला और साहित्य के प्रति अपनी निष्ठा भी बनाए रखनी पड़ी।

1. सवाई ईश्वरीसिंह (1743–1750 ई.): संघर्ष और स्वाभिमान

सवाई ईश्वरीसिंह, सवाई जयसिंह द्वितीय के ज्येष्ठ पुत्र थे। उनका शासनकाल पूरी तरह से अपने सौतेले भाई माधोसिंह के साथ उत्तराधिकार युद्धों में व्यतीत हुआ।

1.1 उत्तराधिकार का मुख्य कारण

मेवाड़ की राजकुमारी चंद्र कंवर (देबारी समझौता) से उत्पन्न पुत्र माधोसिंह का दावा था कि उसे ही जयपुर का राजा बनना चाहिए। जबकि ईश्वरीसिंह ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते गद्दी पर बैठे।

1.2 राजमहल का युद्ध (1747 ई.)

यह युद्ध टोंक के पास राजमहल में लड़ा गया।

  • पक्ष: ईश्वरीसिंह + सूरजमल (भरतपुर) बनाम माधोसिंह + मराठा + बूंदी + कोटा की संयुक्त सेना।

  • परिणाम: ईश्वरीसिंह की शानदार जीत।

  • स्मृति चिन्ह: इस जीत के उपलक्ष्य में उन्होंने जयपुर के त्रिपोलिया बाज़ार में सात मंजिला 'सरगासूली' (ईसरलाट) का निर्माण करवाया।

1.3 बगरु का युद्ध (1748 ई.)

  • पक्ष: ईश्वरीसिंह बनाम माधोसिंह + मराठा (मल्हार राव होल्कर)।

  • परिणाम: ईश्वरीसिंह की पराजय।

  • संधि: ईश्वरीसिंह को माधोसिंह को 5 परगने देने पड़े और मराठों को भारी हर्जाना देना स्वीकार करना पड़ा।

1.4 दुखद अंत

मराठों द्वारा हर्जाने के लिए डाले जा रहे भारी दबाव और अपमान को न सह पाने के कारण, सवाई ईश्वरीसिंह ने 1750 ई. में अपनी ही बनाई सरगासूली से कूदकर आत्महत्या कर ली।


2. सवाई माधोसिंह प्रथम (1750–1768 ई.): कूटनीति और नगर निर्माण

मराठों की सहायता से गद्दी पर बैठने वाले माधोसिंह प्रथम को जल्द ही समझ आ गया कि मराठे मित्र नहीं बल्कि बोझ हैं।

2.1 मराठों का कत्लेआम (1751)

मराठों द्वारा जयपुर की जनता पर किए जा रहे अत्याचारों और धन की मांग से तंग आकर 10 जनवरी 1751 को जयपुर की जनता ने विद्रोह कर दिया और शहर में मौजूद हजारों मराठों का कत्लेआम किया। इसने जयपुर-मराठा संबंधों को हमेशा के लिए कड़वा कर दिया।

2.2 रणथम्भौर की प्राप्ति

माधोसिंह की कूटनीतिक सफलता यह थी कि उन्होंने मुगल सम्राट से रणथम्भौर का ऐतिहासिक किला प्राप्त कर लिया, जो जयपुर की सामरिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण था।

2.3 स्थापत्य और नगर नियोजन

  • सवाई माधोपुर (1763): उन्होंने सवाई माधोपुर नगर बसाया और उसे किले के समान सुरक्षित बनाया।

  • मोती डूंगरी महल: जयपुर में सुंदर महलों का निर्माण।

  • नाहरगढ़ के नौ महल: अपनी नौ पासवानों (रानियों) के लिए नाहरगढ़ दुर्ग में एक जैसे नौ महलों का निर्माण करवाया।


3. सवाई प्रतापसिंह (1778–1803 ई.): जयपुर का सांस्कृतिक स्वर्ण युग

सवाई प्रतापसिंह का काल जयपुर के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण काल माना जाता है। वे स्वयं एक कवि, संगीतज्ञ और कला पारखी थे।

3.1 प्रमुख युद्ध (मराठों से संघर्ष)

प्रतापसिंह ने मराठों की शक्ति को चुनौती देने के लिए कई युद्ध लड़े:

  1. तुंगा का युद्ध (1787): जयपुर और जोधपुर की संयुक्त सेना ने मराठा सेनापति महादजी सिंधिया को पराजित किया। सिंधिया ने तब कहा था— "अगर मैं जीवित रहा तो जयपुर को धूल में मिला दूँगा।"

  2. पाटन का युद्ध (1790): मराठों ने फ्रांसीसी सेनापति डी-बोयने की मदद से जयपुर को हराया।

  3. मालपुरा का युद्ध (1800): मराठों की निर्णायक जीत हुई।

3.2 हवा महल (1799): जयपुर की पहचान

यह जयपुर की सबसे प्रसिद्ध इमारत है।

  • वास्तुकार: लालचंद उस्ता।

  • आकृति: भगवान कृष्ण के मुकुट के समान।

  • संरचना: 953 झरोखे (खिड़कियाँ) और 5 मंजिलें।

  • मंजिलों के नाम: शरद मंदिर, रतन मंदिर, विचित्र मंदिर, प्रकाश मंदिर और हवा मंदिर।

3.3 साहित्य और 'गंधर्व बाईसी'

सवाई प्रतापसिंह 'ब्रजनिधि' उपनाम से कविताएँ लिखते थे। उनके दरबार में 22 विशेषज्ञ कलाकारों, संगीतज्ञों और विद्वानों का एक समूह रहता था जिसे 'गंधर्व बाईसी' (Pratap Guna Chovisi) कहा जाता था।

  • प्रमुख ग्रंथ: 'राधा गोविंद संगीत सार' (ब्रजपाल भट्ट द्वारा संकलित)।


4. सांस्कृतिक एवं सामाजिक योगदान (Table)

शासक स्थापत्य कला साहित्य/कला योगदान
ईश्वरीसिंह सरगासूली (ईसरलाट) -
माधोसिंह I सवाई माधोपुर नगर, नाहरगढ़ के 9 महल मराठा प्रभाव कम करने का प्रयास
प्रतापसिंह हवा महल, शीतला माता मंदिर ब्रजनिधि ग्रंथावली, गंधर्व बाईसी

5. प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए 'Key Points' (Must Remember)

  1. सरगासूली: इसे ईसरलाट भी कहते हैं, यह ईश्वरीसिंह की राजमहल युद्ध में जीत का प्रतीक है।

  2. भाड़ा युद्ध (1761): माधोसिंह और कोटा के बीच रणथम्भौर के अधिकार को लेकर हुआ।

  3. लालचंद उस्ता: हवा महल के मुख्य डिज़ाइनर।

  4. पचरंगा झंडा: इसे मानसिंह ने शुरू किया था, जिसे इन शासकों ने भी जारी रखा।

  5. जयपुर चित्रशैली: प्रतापसिंह के काल में यह अपने चरमोत्कर्ष पर थी।


 निष्कर्ष (Conclusion)

सवाई जयसिंह द्वितीय के बाद का इतिहास यह दर्शाता है कि कैसे जयपुर के शासकों ने विपरीत परिस्थितियों (मराठा आक्रमण और आंतरिक गृहयुद्ध) के बावजूद कला और संस्कृति की लौ को जलाए रखा। जहाँ ईश्वरीसिंह का अंत दुखद रहा, वहीं माधोसिंह ने नगर नियोजन को विस्तार दिया और प्रतापसिंह ने 'हवा महल' के रूप में जयपुर को एक वैश्विक पहचान प्रदान की। राजस्थान के इतिहास के विद्यार्थियों के लिए यह कालखंड युद्धों की रणनीतियों और स्थापत्य कला के बारीकियों को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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